Friday 6 November 2009
जन की सत्ता का स्तम्भ ढहा
Tuesday 3 November 2009
साथी हमें अलग होना है...
अर्पिता ने पढ़ाई और पायनियर के अपने छोटे से करियर के दौरान पत्रकारिता की कापी पर ज़िन्दगी के बुनियादी सवालों को शिद्दत से हल करने की कोशिश की है। मुंबई में उनकी सहाफत एक नए अंदाज़ में ढलेगी। उम्मीद है यहाँ भी वे उतनी ही संजीदा नज़र आएँगी। जिस संजीदगी के लिए मैंने कभी उन्हें अर्पिता सरोकार के खिताब से नवाजा था।
दोस्त जब मकाम पाते हैं तो सबसे ज्यादा खुशी दोस्तों के उस घेरे को ही होती है जिसके बीच बैठ कर आपने उस मकाम के ख्वाब सजाये थे। अंततः अर्पिता जा रहीं हैं जहाँ उन्हें जाना था। पूरा घेरा खुश है। जिसकी एक कड़ी मैं भी रहा हूँ। निश्चित तौर पर अर्पिता की इस सफलता पर कई चेहरे मुझसे भी ज्यादा रौशन होंगे। उन्हें होना भी चाहिए क्यूंकि उनका नूर ही मेरी ज़िन्दगी की जीनत है।
और इस तहरीर के सबसे आखिरी हिस्से में परम वैयक्तिक बात। एक दुःख भी। पिछले बड़े वक्त से जो दोस्ती मेरी सबसे बड़ी सामर्थ्य रही है अब कुछ दूर नज़र आने लगी है। हलाँकि ये उतनी बड़ी बात नही है की जश्न के माहौल के धुंधला कर दे। अर्पिता जा रहीं हैं तो बड़ी खुशियों और दुआओं से उनकी विदाई होगी। फिलहाल ज़हन में बच्चन तेज़ी से कौंध रहे हैं।
(१)
छोटे से जीवन में कितना प्यार करूँ पी लूँ हाला
आने के ही साथ जगत में कहलाया जाने वाला
स्वागत के ही साथ विदा की होती देखी तैयारी
बंद लगी होने खुलते ही मेरी जीवन मधुशाला
(२)
साथी हमें अलग होना है
मिल कर एक गीत आ गा लें
मिलकर दो-दो अश्रु बहा लें
अलग-अलग ही अबसे हमको
जीवन में गाना रोना है
साथी हमें अलग होना है
Sunday 1 November 2009
जन्मदिन मुबारक शाहरुख !

ऐश्वर्या की सालगिरह !
Wednesday 28 October 2009
डेविड शेफर्ड की अम्पायरिंग याद है ?

Monday 26 October 2009
लखनवी तहजीब से ताज़ा मुलाक़ात
एस-४ बोगी में रिज़र्वेशन था। मेरी सीट जिस सेक्शन में थी वहां की लाईट में कुछ दिक्कत थी इसलिए आठों बर्थ के लोग ट्रेन चलने के कुछ वक्त बाद ही सोने की तैय्यारी करने लगे क्यूंकि वैसे भी डिपारचर टाइम २२.४५ रात्रि का था। सहयात्रियों से खास परिचय भी नही हो पाया था। लेकिन बातचीत के लहजे से मुझे समझ आ गया था की ज्यादातर "अमां यार" के तकिया कलाम वाले लखनवी हैं। इसलिए और किसी तारुफ़ की ज़रूरत नही रह गई थी।
अभी सभी ने पहली झपकी ली ही होगी की किसी ने पंखा चला दिया। अब अक्टूबर के अंत में इतनी ठंडक तो हो ही जाती है की पंखे के बिना ही काम चल जाता है। इसलिए जब पंखा चला जो हजरत अपर बर्थ पर थे वो जड़ाने लगे। बेचारे नीचे उझक कर बोले "अमां पंखा चल गया है क्या " मैंने सोचा की शायद ये अंदाज़ लखनऊ का ही होगा की साहब ठिठुर रहे थे फिर भी किसी पर आरोप मढ़ते हुए ये नही पुछा की पंखा आपने चलाया है क्या ? पुछा की "अमां पंखा चल गया है क्या" ?
अभी मैं इस अदबी विश्लेषण में लगा ही था की पंखा बंद हो गया। एक विनम्र स्वीकारोक्ति के साथ -"मच्छर काट रहे थे।" मिडिल बर्थ पर जो हुजुर थे रेलवे के मच्छर उनकी शान में गुस्ताखी कर रहे थे। बाकियों से कुछ ज्यादा ही क्यूंकि बेचारे बीच में फंसे थे। और अँधेरा भी था। जब हारने लगे तो पंखा चला दिया।
ऊपर वाले साहब ने जब सुना मच्छर काट रहे थे तो बेचारे दुगनी विनम्रता से बोले "चलने दीजिये।" अब बीच वालों को बोलना था- "नही कोई बात नही, ऊपर जाड़ा लग रहा होगा।" फिर ऊपर वाले साहब बोले- "अमां नही , मच्छर चब जायेंगे" । फिर बीच वाले मियाँ बोले- "थोडी देर में नींद आ जायेगी तो पता ही नही चलेगा, पंखे से आपको सीधी हवा लग रही होगी।"
ऊपर वाले सरकार भी ऐसे कैसे मान जाते। आख़िर पहले आप वाली तहजीब में सामने वाली की सहुलियत को ख़ुद के आराम से ऊपर जो रखना होता है। ऊपर से बोले- "मच्छरों की भिन-भिन में नींद नही आएगी, मैंने चदरा ओढ़ लिया है ; आप पंखा चला लीजिये" । इसके बाद बीच वाले साहब ने बिना कोई जवाब दिए पंखा चला दिया। मैं सोचने लगा की क्या किसी और जगह भी दूसरे की सुविधा का इतना जिद्दी ख़याल रखा जाता होगा। कुछ वक्त बाद ही सब लोग नींद के आगोश में जा चुके थे। पंखे की आवाज़ भी बंद हो गई थी।
"लखनऊ है तो महज़ गुम्बदो-मीनार नही
सिर्फ़ एक शहर नही कूचा-ओ-बाज़ार नही
इसके दामन में मुहब्बत के फूल खिलते हैं
इसकी गलियों में फरिश्तों के पते मिलते हैं"
Thursday 15 October 2009
धर्म के कुँए में स्वतंत्र चिंतन की पालथी !
धर्म और स्वतंत्र चिंतन के सिलसिले की इस बहस में मेरा तर्क था की जब हम स्वतंत्र चिंतन की बात धर्म के परिप्रेक्ष्य में करें तो इसके केंद्र में यही बात रहनी चाहिए की आपका चिंतन धर्म के अवांछित पेचोखम में न उलझे, वरना आपका चिंतन भी उस मुसलसल ज़ंजीर की एक कड़ी भर होगा जिसने बरसों से व्यक्ति को अन्य विश्वासों के करीब आने से रोक रखा है. जिलानी साहब के लेख में सूफीवाद का उल्लेख है. सूफियों का उल्लेख उन्होंने इस्लाम में लिबरल नज़रिए को ज़ाहिर करने के लिए किया था.हलाँकि इस्लाम में इसको लेकर अन्तर्निहित विरोधाभास को भट्ट जी ने सामने रखा तो मुझे अपनी धारणा और प्रबल होती दिखी. धर्म को लेकर हमें तीन मोटे-मोटे विचार मिलते हैं एक जिसमें धरम को उसके पारंपरिक स्वरुप में स्वीकार करने की बात कही जाती है जिसमें हदीस और वैदिक परंपरा दोनों ही मानी जा सकती हैं.एक जो धर्म को बिलकुल ही खारिज करने की वकालत करती है जिसके अनुयायिओं को आजकल अनायास ही कम्युनिस्ट बना दिया जाता है.और इन दोनों के बीच एक सुधारवादी विचारधारा जो धर्म के कट्टर स्वरुप को हटा कर उसे अपेक्षाकृत सुग्राही और नवोन्मेषपूर्ण करने पर विचार रखती है. इस लिहाज से जब संत माने जाने वाले सूफी भी मज़हब की नयी रिवायत शुरू करते हैं तो एक खास किस्म के अल्लाह के बन्दों के निशाने पर रहते हैं.क्यूंकि धरम की पुरानी मान्यताएं टूटती हैं. शैतान की आवाज़ माना जाने वाला संगीत एक तबके को हराम होता है तो दूसरा उसपर झूमता है.यहाँ सूफी भले ही धर्म से पूरी तरह बाहर निकलकर भले ही न सोच पाए हों लेकिन जिलानी साहब ने जिस परिप्रेक्ष्य में उनका उल्लेख किया है उसमें वो बहुत हद तक सही हैं क्यूंकि सूफी धर्म से पूरी तरह बाहर नहीं निकले लेकिन उन्होंने धरम की पूरी तरह से नयी धारणा विकसित की जो भी एक तरह का स्वतंत्र चिंतन तो है ही. अगर सूफी धरम से बाहर निकल जाते तो उनपर भी कम्युनिस्ट होने का ठप्पा लगने का खतरा था.लेकिन कम से कम सूफी इस दृष्टि से निर्विवाद रूप से अहम् हैं की उन्होंने धर्म की संकीर्णताओं से ऊपर उठकर सोचा.भले ही उन्होंने धर्म के ढाँचे को बने रहने दिया हो.इस लिहाज से ये नहीं कहा जा सकता की इस्लाम में स्वतंत्र चिंतन नहीं हुआ. लेकिन एक बात बिलकुल निश्चित है की इसकी कमी और उससे भी ज्यादा इसकी व्यापक स्वीकार्यता इस्लाम में हमें कम दिखती है जिसकी बात भट्ट जी ने की. यहाँ एक नयी बहस जन्म ले सकती है की प्रगतिशीलता या प्रोग्रेस्सिव स्ट्रीम का संचरण इस्लाम में क्यूँ मुश्किल होता है. क्यूंकि रचना ने पानी पोस्ट में कुछ बिलकुल वाजिब प्रश्न उठाये थे की धरम को लेकर परंपरागत मुस्लिम समाज जितना आग्रही और आक्रामक है उतना शायद ही कोई और मज़हब हो.भले ही ऐसा ग़लतफहमी और गलतबयानी को लेकर उपजा हो.यहाँ एक और बात कहने लायक है की हिन्दू समाज भी अपने जिस सहिष्णु होने का दंभ भरता है वो इसीलिये है क्यूंकि उसके पास कुछ सिरफिरे फतवों का हवाला है वरना बाबा पार्टी की कमी यहाँ भी नहीं है.ह्रदय नारायण दीक्षित ने अपने लेख में ऋग्वेद को जिस तरह पेश किया है उससे इतर भी सोचे जाने के ज़रूरत है क्यूंकि मनुवाद अपने आदिम स्वरुप में इसीके पुरुष सूक्त में मिलता है और इसी की वेदवाणी शूद्रों के कान में पड़ने पर सीसा पिघलाकर डाला जाता था.असल में समस्या यह है की हम धर्म को लेकर सोचने बैठते हैं तो बहुत इंटेंस थिंकिंग करते हैं लेकिन धर्म के उसी घेरे के अन्दर सोचते रह जाते हैं.दीक्षित जी का वेदों पर गहन अध्ययन है क्या कभी उन्होंने इसबात का भी संकलन किया है की वेदों की कितनी ऋचाएं अन्यायमूलक हैं.धर्म का आनुयायिक चिंतन खूब होता है.अगर इस चिंतन को पैमाना बनाया जाय तो निश्चित रूप से इस्लाम में भी अभाव नहीं है. अल्लामा इकबाल के उदारवादी नज़रिए को भी इस विचार से हारना पड़ता है तो ज़ाहिर तौर पर ये बहुत प्रबल है.इसीलिए तसलीमा, साइमन जैसी नारीवादी भी धर्म को औरत पर अत्याचार के यन्त्र के रूप में देखती हैं.अपने धर्म की अच्छाइयों को लेकर व्यापक बहस होती है लेकिन इसकी कमियों को उजागर करने सम्बन्धी बहस क्यूँ नहीं होती.कुछ ही रोज़ पहले कल्बे सादिक साहब ने मुस्लिम महिला आन्दोलन के अधिवेशन में इस्लाम में महिलाओं की असहजता पर कुछ बात करते हुए उनकी हिस्सेदारी को लेकर जो सवाल उठाया वो भी कईयों को नागवार गुज़ारा. याद रहे की सादिक साहब ने इसमें ये भी कहा था की पैगम्बरों के ज़माने की हरबात जैसे की तैसी नहीं उतारी जा सकती इससे महिलाओं को खासकर बड़ी तकलीफ होती है.क्यूंकि इनमें से कई बेसिरपैर की हैं. ये एक बड़े दिल वाली स्वीकृति थी जिसकी आलोचना भी कम नहीं हुई उसी तरह जिस तरह सूफियों को भी नकार का सामना करना पड़ा. ये अलग बात है की उदारवादी गैरमुस्लिम सम्प्रदाय दोनों के प्रति सबसे ज्यादा श्रद्धावान रहता है. कल्बे सादिक आज भी सभी मंचों पर सम्मानित हैं. चाहें वह क्रांतिकारी नमाज़ का फैसला हो या कुम्भ में डुबकी लगाने का. सभी कुछ साम्प्रदायिक सौहार्द के लिए संजीवनी का काम करता है.. जब सादिक साहब ने महिलाओं के तकलीफ में होने की बात कही तो मुझे वाल्मीकि रामायण का एक प्रसंग याद आया.मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् राम सीता की तुलना कुत्ते के जूठे घी से करते हुए कहते हैं की "अब तुम सच्चरित्र या दुश्चरित्र जो भी हो मैथिलि. मैं तुम्हारा उपभोग नहीं कर सकता.अब तुम कुत्ते के चाटे घी के सामान हो जिसका उपभोग नहीं किया जा सकता.(वाल्मीकि रामायण ३.२५७.१३).धरम को खारिजं करना मुश्किल काम है लेकिन उदारवादी नजरिया तो रखा ही जा सकता है. और कमसे कम अन्यायमूलक बातों की आलोचना तो होनी ही चाहिए. इसके लिए किसी भी स्वतंत्र चिंतन की बहुत ज्यादा आवश्यकता नहीं है.

