Friday 6 November 2009

जन की सत्ता का स्तम्भ ढहा

प्रभाष जी चले गएसचिन और क्रिकेट के दीवाने से टीम इंडिया की ऐसी रुसवाई देखी नही गईसचिन जब आउट होता है और इंडिया हार जाती है तो क्रिकेट प्रेमी अक्सर दर्शक दीर्घा या कमरा छोड़ जाते हैंप्रभाष जी दुनिया ही छोड़ गएअगर वो होते तो निश्चित तौर पर सचिन की इस बेमिसाल पारी को कई मिसालें और मिलतीं


मृत्यु से कुछ घंटों पहले ही वे जनसत्ता लखनऊ की उसी कुर्सी पर बैठे थे जहाँ बैठकर मैंने इस संस्थान में पत्रकारिता के गुर सीखे थेयहाँ के ब्यूरो चीफ अम्बरीश कुमार की तबियत नासाज़ थी तो उनका हाल जानने आए थे, जिद करके और जाते-जाते अभिभावक की तरह झिड़की भी दे गए थे "अपना ख्याल रखा करो" । इत्तेफाक से जब मैंने फ़ोन किया तो पत्रकारिता के बीते दौर की चर्चाएं चल ही रहीं थींमैंने जाने कितने ही लोगों को बताया की आज जोशी जी लखनऊ में थेकुछ ही वक्त बाद जब उनके जाने की ख़बर सुनी तो यकीं ही नही हुआ


जनसत्ता ने हमेशा मुझे अपनी तरफ़ खीचा हैमित्र मंडली में जब मैं जनसत्ता जाने के सपने की बात करता था तो दोस्त यही कहते थे की वहां जाना बुढापे में पहले खूब काम कर लो वहां वानप्रस्थ होता हैमुझे जल्दी थीप्रभाष जी के स्वप्न के साथ जुड़ने की उनके जीवनकाल में हीअलोक तोमर साहब या अम्बरीश जी को जब प्रभाष जी के विषय में बात करते सुनता हूँ तो रश्क होता है। प्रभाष जी उस जनसत्ता परिवार के अभिभावक थे और मैं इस परिवार का हिस्सा बनना चाहता था। प्रभाष जी जल्दी चले गए या कहें मैंने ही देर कर दीहो सकता है की कभी जनसत्ता पहुच जाऊं लेकिन उस आकर्षण और जूनून में एकाएक कमी गई हैक्यूंकि वो प्रभाष जी से ही थाजोशी जी के बिना जनसत्ता कैसा होगा इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है


जिस साल बैचके सब लोग हिन्दुस्तान, सहारा, अमर-उजाला और जागरण में इंटर्नशिप करने गए थे मैंने जनसत्ता लखनऊ को चुना था इसलिए ताकि जनसत्ता के अनुभव पर इतरा सकूँ, भले ही ये इन्टर्न के तौर पर ही क्यूँ हो

मेरा मिजाज़ भी जनसत्ता के ही करीब था, लखनऊ में जागरण और हिन्दुस्तान की रौनक के सामने भले ही ये उतना चमकीला दीखता हो लेकिन इसका अलग रंग आपको ज़रूर नज़र आएगाजैसे की मैं बैच में चमकीला नही था लेकिन कुछ अलग पहचान तो थी ही


इन्टर्न के दौरान ही पहली बार प्रभाष जी से मिला था। ह्रदय नारायण दीक्षित की किताब के लोकार्पण कार्यक्रम मेंहिंद स्वराज और यंगिस्तान पर अद्भुत बोले थेउसके बाद विश्वविद्यालय में हमारी फेयरवेल पार्टी में आए थे और बोल गए थे की आप भारत के सबसे अच्छे पत्रकारिता संस्थान के हिस्से हैं


सत्रह नवम्बर को जनसत्ता का जन्मदिन होता हैपत्रकारिता के विद्यार्थी तो प्रभाष जी के हमेशा कृतज्ञ रहेंगे की उन्होंने हिन्दी माध्यम के विद्यार्थियों को एकमात्र पढने लायक अखबार दियागज़ब अखबारजो रिक्शे वाले और गाय की फोटो फ्रंट पेज पर लगाता हैअभी तक पूरी हेडिंग छापता है। उल्टे सीधे विज्ञापनों से दूर हैफिल्मी चर्चाओं में वक्त नही बरबाद करता। संस्कृति पत्रकारिता को अभी तक गंभीर विषय मानता हैसाजिद रशीद और तरुण विजय को एकदम ऊपर नीचे छापता है.ये सब प्रभाष जी का दिया हुआ हैसम्पादक वही थे सही मायनों में। जब तक वो रहे मालिक नही चम्बल में डाकुओं का समर्पण और बढ़ी तनखा लेने से इनकार केवल वही कर सकते हैंनियमों से समझौता नही किया। पत्रकारिता की पूरी एक खेप तैयार कीअलोक तोमर जनसत्ता से जाने के बाद भी उनके भक्त हैंअम्बरीश जी को मिलने का वक्त नही दिया क्यूंकि मालिक की धौंस लेकर आए थे


चौथे थाने का ये थानेदार अपने अन्तिम वक्त तक अपराधियों को शिकंजे में लेता रहा। कागद कारे जैसा वृहद् कालम उम्र की इस अवस्था में लिख पाना उन्ही के बस की बात थीप्रभाष जी के भारत-ऑस्ट्रलिया मैच पर लिखने की उम्मीद थी जो अधूरी रह गईइस दौर में मैंने पत्रकारिता का एक ही महापुरुष देखा और वो हैं प्रभाष जीइलेक्ट्रोनिक मीडिया ने भी उनके निधन को खूब-खूब कवर कियाबहुत दिनों बाद उसकी भूमिका से खुशी हुईप्रभाष जी आपकी सबसे ज्यादा कमी अगर किसी को खलेगी तो वो पत्रकारिता की तरुण पीढी है...

Tuesday 3 November 2009

साथी हमें अलग होना है...

ज़िन्दगी ज्यादातर गर्मियों की उमस भरी रात की तरह ही रहती है। कोई हरकत नही,कोई बरकत नही। ऐसे में हवा का एक झोंका भी बड़ी राहतें लेकर आता है। राहत से भी कुछ ज्यादा। बहुत ज्यादा। ये झोंका बिल्कुल ताज़ा है। भोपाल में पत्रकारिता विश्वविद्यालय के अन्दर-बाहर मेरी सबसे बड़ी हमराह और हमारे बैच में मुद्दों को सबसे मजबूती से थामने वाली अर्पिता सरकार मुंबई जा रहीं हैं । भारतीय मीडिया के सबसे प्रतिष्ठित समूहों में से एक नेटवर्क-18 को नवाजने। वक्त के मौजूदा हिस्से में इससे बड़ी खुशी मुमकिन नही है।

अर्पिता ने पढ़ाई और पायनियर के अपने छोटे से करियर के दौरान पत्रकारिता की कापी पर ज़िन्दगी के बुनियादी सवालों को शिद्दत से हल करने की कोशिश की है। मुंबई में उनकी सहाफत एक नए अंदाज़ में ढलेगी। उम्मीद है यहाँ भी वे उतनी ही संजीदा नज़र आएँगी। जिस संजीदगी के लिए मैंने कभी उन्हें अर्पिता सरोकार के खिताब से नवाजा था।

दोस्त जब मकाम पाते हैं तो सबसे ज्यादा खुशी दोस्तों के उस घेरे को ही होती है जिसके बीच बैठ कर आपने उस मकाम के ख्वाब सजाये थे। अंततः अर्पिता जा रहीं हैं जहाँ उन्हें जाना था। पूरा घेरा खुश है। जिसकी एक कड़ी मैं भी रहा हूँ। निश्चित तौर पर अर्पिता की इस सफलता पर कई चेहरे मुझसे भी ज्यादा रौशन होंगे। उन्हें होना भी चाहिए क्यूंकि उनका नूर ही मेरी ज़िन्दगी की जीनत है।

और इस तहरीर के सबसे आखिरी हिस्से में परम वैयक्तिक बात। एक दुःख भी। पिछले बड़े वक्त से जो दोस्ती मेरी सबसे बड़ी सामर्थ्य रही है अब कुछ दूर नज़र आने लगी है। हलाँकि ये उतनी बड़ी बात नही है की जश्न के माहौल के धुंधला कर दे। अर्पिता जा रहीं हैं तो बड़ी खुशियों और दुआओं से उनकी विदाई होगी। फिलहाल ज़हन में बच्चन तेज़ी से कौंध रहे हैं।
(१)
छोटे से जीवन में कितना प्यार करूँ पी लूँ हाला
आने के ही साथ जगत में कहलाया जाने वाला
स्वागत के ही साथ विदा की होती देखी तैयारी
बंद लगी होने खुलते ही मेरी जीवन मधुशाला

(२)

साथी हमें अलग होना है

मिल कर एक गीत आ गा लें
मिलकर दो-दो अश्रु बहा लें
अलग-अलग ही अबसे हमको
जीवन में गाना रोना है

साथी हमें अलग होना है

Sunday 1 November 2009

जन्मदिन मुबारक शाहरुख !



किंग खान के नाम से मशहूर शाहरुख खान की बादशाहत फ़िल्मी दुनिया की रंगीनियों से लेकर फैन्स के दिलों की वादियों तक शिद्दत से कायम है। समकालीन हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े नुमाइंदों में से एक शाहरुख अपनी फिल्मों में ज्यादातर मुहब्बत के नाज़ुक रूमानी अहसासों में गुम शख्स की भूमिका निभाते नज़र आते हैं लेकिन अदाकारी के इस बादशाह के लिए असल ज़िन्दगी कभी फूलों की सेज की तरह नहीं रही। आज भी नहीं जब की वह उम्र के एक नए साल में कदम रख रहे हैं। बुलंदी पर काबिज़ होते हुए भी उनका परवाज़ लगातार जारी है।


छोटे परदे से होते हुए पहली बार अपने दर्शकों के बीच पहुचे शाहरुख आज भी इस बात के लिए सबसे बड़ा अपवाद हैं की टीवी सितारे की चमक बड़े आसमान पर कम हो जाती है। अपने बिलकुल शुरूआती सीरियल फौजी में उन्होंने एक निष्ठावान सिपाही की भूमिका निभाई थी और बड़े परदे पर भी उनके निभाए किरदारों का सबसे बड़ा चारित्रिक गुण निष्ठा ही रहा।


कुछ कुछ होता है में उन्होंने दोस्ती को प्रेम के समतुल्य ला खडा किया तो दिल वाले दुल्हनिया ले जायेंगे में एक धीर और उदात्त प्रेमी की भूमिका में नज़र आये। परदेस, यस बॉस और कभी ख़ुशी-कभी गम जैसी फिल्में भी इसी सिलसिले में आगे बढती दिखाई देती है। हलाँकि मोहब्बतें, फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी और चक दे इंडिया में उनकी निष्ठा एक जिद में बदलती दिखाई देती है। ये जिद उस जिद से मिलती जुलती है जिसने उन्हें दिल्ली की गलियों से उठाकर मायानगरी की बुलंदियों तक पंहुचा दिया।


दिल्ली में पैदा हुए और पले बढे शाहरुख ने जामिया मिलिया विश्वविद्यालय से जनसंचार की पढाई की है शायद इसी वजह से वे मीडिया को लेकर ज्यादा बेबाक राय रखते हैं। अलग अलग श्रेणियों में कुल मिलाकर ग्यारह फिल्मफेयर अवार्ड्स जीत चुके शाहरुख का स्टारडम पिछले दो दशकों में वैसा ही रहा है जैसा सत्तर और अस्सी के दशक में अमिताभ बच्चन का था। शायद इसीलिए शाहरुख के समक्ष अगर कोई एक प्रतिमान बार-बार आता है या लाया जाता है तो वह अमिताभ बच्चन का ही है। डॉन और कौन बनेगा करोड़पति के मंच इन दोनों सितारों की प्रतिभा की कसौटी बनते रहे हैं।


समकालीनों में आमिर और सलमान के साथ मिलकर शाहरुख वो खान तिकडी बनाते हैं जिसने पिछले दो दशको में भारतीय जनमानस को सबसे ज्यादा लुभाया है। हलाँकि इनके आपसी विवादों ने उसे खूब निराश भी किया है। काजोल के साथ उनकी जोड़ी की लोकप्रियता बीते ज़माने की राजकपूर नर्गिस और रेखा-अमिताभ से भी ज्यादा सफल और लोकप्रिय है तो असल ज़िन्दगी में गौरी उन्हें पूरा करती दिखाई देती हैं।


आज जब फ़िल्मी दुनिया में लगातार नयी प्रतिभाएं कदम रख रहीं हैं तो उम्र के चौथे दशक में खड़े शाहरुख की बुलंदी उनसे और कड़ी मेहनत और साधना की मांग करती हैं। इसी से वे ओम शांति ओम में सिक्स पैक एब्स में नज़र आते हैं बावजूद इसके की उनके पीठदर्द ने पिछले कुछदिनों में उन्हें ही नहीं उनके फैन्स को भी परेशान किया है। लेकिन इस जन्मदिन पर किंग खान के फैन्स उनके लिए यही दुआ करेंगे की उनके दिलों पर शाहरुख का राज इसी तरह कायम रहे। (भास्कर.कॉम)

ऐश्वर्या की सालगिरह !

आज बॉलीवुड की सबसे खूबसूरत अदाकारा ऐश्वर्या राय बच्चन की सालगिरह है। 1 नवम्बर 1973 को जन्मी ऐश्वर्या ने अपने करियर में ऐसे कई मकाम हासिल किये हैं जो आने वाली पीढियों के लिए प्रेरणा बन सकते हैं। 1994 में पूरी दुनिया में अपनी खूबसूरती का परचम लहराने वाली ऐश को उनके प्रशंसकों ने कई भूमिकाओं में देखा है और लगभग हर भूमिका में उन्हें सराहा है।ऐश्वर्या ने करियर की शुरुआत तमिल फिल्म इरुवर से 1997 में की थी। यहाँ से हिंदी फिल्मों के रास्ते उन्होंने सफलता की मंजिल पायी और बाद में अंग्रेजीदां लोगों को भी अपने हुनर का लोहा मनवाया। ऐश्वर्या को सैकडों बार दुनिया की सबसे खूबसूरत महिला कहा है। सौंदर्य की ऐसी गूँज इससे पहले राजमाता गायत्री देवी के अलावा भारत में किसी की नहीं रही। ऐश्वर्या के दैवीय सौंदर्य को उनके प्रशंसकों ने बड़े परदे पर खूब-खूब देखा है। 19 सदी के लखनवी नाज़ से सजी उमराव जान से लेकर धूम की अत्याधुनिक सुनहरी तक उनकी कई मुद्राएं हैं। लेकिन फ़िल्मी दुनिया में ऐश्वर्या का दखल सिर्फ अपनी खूबसूरती भर से नहीं है। ताल, हम दिल दे चुके सनम, गुरु, जोधा अकबर,देवदास जैसी फिल्में उनके अभिनय की बानगी पेश करती है। ऐश्वर्या की कशिश उन्हें लगातार चर्चा में बनाए रखती है। चाहें वह निजी संबंधों को लेकर हो या अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर सम्मानित होने को लेकर। अमिताभ बच्चन की बहू बनने के बाद भी ऐश्वर्या उन सितारों की फेहरिस्त में शामिल नहीं हुईं जो शादी के बाद फीके पड़ जाते हैं. बच्चन परिवार से उनके जुडाव ने इस सितारा परवार में एक नगीना और जोड़ा है।ऐश्वर्या आज भी इन्टरनेट पर सबसे ज्यादा सर्च की जाने वाली भारतीय महिला हैं। उनके पास ढेरों हॉलीवुड-बॉलीवुड प्रोजेक्ट हैं। उनके नाम से शैक्षणिक संस्था भी देखने को मिल सकती है. अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारतीय सौंदर्य की नुमाइंदगी करती हैं। ऐश्वर्या-अभिषेक की जोड़ी बाज़ार में अभी भी सबसे भारी है। इस लिहाज से ये कहा जा सकता है ऐश्वर्या भारतीय फलक पर वो सितारा हैं जो फलक के आगे के जहाँ को भी रौशन कर रहा है

Wednesday 28 October 2009

डेविड शेफर्ड की अम्पायरिंग याद है ?



मंगलवार को क्रिकेट की दुनिया में एक लम्बी खामोशी छा गयी। २२ साल तक अहम् मौकों पर अपने सधे हुए फैसलों से इस खेल के रोमांच को चरम पर पंहुचाने वाले पूर्व अंपायर डेविड शेफर्ड का निधन हो गया।


घंटों तक मैदान पर एक ही मुद्रा में खड़े रहना कईयों को उबाऊ लग सकता है अगर उन्होंने नेल्सन स्कोर्स पर शेफर्ड की अदाएं नहीं देखीं हैं। अंतर्राष्ट्रीय अम्पायरिंग को अलविदा कहते वक़्त शेफर्ड ने कहा था हो सकता है की लोग मुझे एक मोटे अंपायर के रूप में याद करें जो कुछ खास स्कोर्स पर एक पैर पर खडा होकर उछलता था, लेकिन मैं ऐसा किसी दिखावे के तौर पर नहीं करता। मैं जिस पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखता हूँ(उत्तरी डेवोन), वहां लोग कुदरती तौर पर ऐसे कई यकीन रखते हैं। मतलब साफ़ है की शेफर्ड अपने उबाऊ माने जाने वाले काम का भी लुत्फ़ हासिल करना जानते थे।


मैच के दौरान उनकी गिनती मैदान पर मौजूद सबसे जिंदादिल व्यक्तियों में होती थी। उनका ये अंदाज़ अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कहने के बाद भी नहीं बदला। पिछले ही साल शेफर्ड ने 67 साल की उम्र में अपनी दीर्घकालिक मित्र जेनी से शादी की।


अपने हंसमुख स्वभाव के लिए मशहूर डेविड शेफर्ड क्रिकेट के उन चंद अम्पायरों में से थे जिन्हें अपने फैसलों पर पूरा यकीन होता था। खुशमिजाज शेफर्ड माने जाने वाले शेफर्ड नियमों को लेकर भी सख्त थे। एक बार एजबेस्टन में वे अपने ही देश के माइक अथर्टन से भिड गए थे क्योंकि माइक सचिन तेंदुलकर पर फब्तियां कस रहे थे।


अपने 56वे टेस्ट में जब शेफर्ड ने तीन नो बाल मिस कर दी थी और सक़लैन मुश्ताक को इनपर विकेट मिल गया था तो अपनी इस चूक के चलते शेफर्ड को खुद पर बहुत ग्लानि हुई थी। इस घटना के बाद उनकी तबियत तक खराब हो गयी थी और उन्होंने टेस्ट क्रिकेट छोड़ने का मन बना लिया था।


वेस्टइंडीज के तेज़ गेंदबाज़ कर्टली एम्ब्रोस तो अपने आखिरी मैच में मैदान पर ही भावुक हो गए थे। शेफर्ड क्रिकेट में तकनीक के प्रयोग के भी हिमायती थे लेकिन उनका ये भी मानना था कि क्रिकेट में अंपायर की भूमिका केवल चौके और छक्कों के निर्धारण की नहीं हो सकती।(भास्कर.कॉम)

Monday 26 October 2009

लखनवी तहजीब से ताज़ा मुलाक़ात

पिछले दिनों दिवाली के त्यौहार पर लखनऊ के नूर से नहाने के बाद नौकरी के लिए भोपाल वापस लौट रहा था। मंगलवार का दिन था । चारबाग स्टेशन के जिस हिस्से को रिवायती बोलचाल में छोटी लाइन कहा जाता है वहां से लखनऊ-एलटीटी एक्सप्रेस पर सवार हुआ। ये ट्रेन लखनऊ से बनकर ही चलती है और भोपाल होते हुए मुंबई जाती है

एस-४ बोगी में रिज़र्वेशन था। मेरी सीट जिस सेक्शन में थी वहां की लाईट में कुछ दिक्कत थी इसलिए आठों बर्थ के लोग ट्रेन चलने के कुछ वक्त बाद ही सोने की तैय्यारी करने लगे क्यूंकि वैसे भी डिपारचर टाइम २२.४५ रात्रि का था। सहयात्रियों से खास परिचय भी नही हो पाया था। लेकिन बातचीत के लहजे से मुझे समझ आ गया था की ज्यादातर "अमां यार" के तकिया कलाम वाले लखनवी हैं। इसलिए और किसी तारुफ़ की ज़रूरत नही रह गई थी।

अभी सभी ने पहली झपकी ली ही होगी की किसी ने पंखा चला दिया। अब अक्टूबर के अंत में इतनी ठंडक तो हो ही जाती है की पंखे के बिना ही काम चल जाता है। इसलिए जब पंखा चला जो हजरत अपर बर्थ पर थे वो जड़ाने लगे। बेचारे नीचे उझक कर बोले "अमां पंखा चल गया है क्या " मैंने सोचा की शायद ये अंदाज़ लखनऊ का ही होगा की साहब ठिठुर रहे थे फिर भी किसी पर आरोप मढ़ते हुए ये नही पुछा की पंखा आपने चलाया है क्या ? पुछा की "अमां पंखा चल गया है क्या" ?

अभी मैं इस अदबी विश्लेषण में लगा ही था की पंखा बंद हो गया। एक विनम्र स्वीकारोक्ति के साथ -"मच्छर काट रहे थे।" मिडिल बर्थ पर जो हुजुर थे रेलवे के मच्छर उनकी शान में गुस्ताखी कर रहे थे। बाकियों से कुछ ज्यादा ही क्यूंकि बेचारे बीच में फंसे थे। और अँधेरा भी था। जब हारने लगे तो पंखा चला दिया।

ऊपर वाले साहब ने जब सुना मच्छर काट रहे थे तो बेचारे दुगनी विनम्रता से बोले "चलने दीजिये।" अब बीच वालों को बोलना था- "नही कोई बात नही, ऊपर जाड़ा लग रहा होगा।" फिर ऊपर वाले साहब बोले- "अमां नही , मच्छर चब जायेंगे" । फिर बीच वाले मियाँ बोले- "थोडी देर में नींद आ जायेगी तो पता ही नही चलेगा, पंखे से आपको सीधी हवा लग रही होगी।"

ऊपर वाले सरकार भी ऐसे कैसे मान जाते। आख़िर पहले आप वाली तहजीब में सामने वाली की सहुलियत को ख़ुद के आराम से ऊपर जो रखना होता है। ऊपर से बोले- "मच्छरों की भिन-भिन में नींद नही आएगी, मैंने चदरा ओढ़ लिया है ; आप पंखा चला लीजिये" । इसके बाद बीच वाले साहब ने बिना कोई जवाब दिए पंखा चला दिया। मैं सोचने लगा की क्या किसी और जगह भी दूसरे की सुविधा का इतना जिद्दी ख़याल रखा जाता होगा। कुछ वक्त बाद ही सब लोग नींद के आगोश में जा चुके थे। पंखे की आवाज़ भी बंद हो गई थी।

"लखनऊ है तो महज़ गुम्बदो-मीनार नही
सिर्फ़ एक शहर नही कूचा-ओ-बाज़ार नही
इसके दामन में मुहब्बत के फूल खिलते हैं
इसकी गलियों में फरिश्तों के पते मिलते हैं"

Thursday 15 October 2009

धर्म के कुँए में स्वतंत्र चिंतन की पालथी !


धर्म और स्वतंत्र चिंतन के सिलसिले की इस बहस में मेरा तर्क था की जब हम स्वतंत्र चिंतन की बात धर्म के परिप्रेक्ष्य में करें तो इसके केंद्र में यही बात रहनी चाहिए की आपका चिंतन धर्म के अवांछित पेचोखम में न उलझे, वरना आपका चिंतन भी उस मुसलसल ज़ंजीर की एक कड़ी भर होगा जिसने बरसों से व्यक्ति को अन्य विश्वासों के करीब आने से रोक रखा है. जिलानी साहब के लेख में सूफीवाद का उल्लेख है. सूफियों का उल्लेख उन्होंने इस्लाम में लिबरल नज़रिए को ज़ाहिर करने के लिए किया था.हलाँकि इस्लाम में इसको लेकर अन्तर्निहित विरोधाभास को भट्ट जी ने सामने रखा तो मुझे अपनी धारणा और प्रबल होती दिखी. धर्म को लेकर हमें तीन मोटे-मोटे विचार मिलते हैं एक जिसमें धरम को उसके पारंपरिक स्वरुप में स्वीकार करने की बात कही जाती है जिसमें हदीस और वैदिक परंपरा दोनों ही मानी जा सकती हैं.एक जो धर्म को बिलकुल ही खारिज करने की वकालत करती है जिसके अनुयायिओं को आजकल अनायास ही कम्युनिस्ट बना दिया जाता है.और इन दोनों के बीच एक सुधारवादी विचारधारा जो धर्म के कट्टर स्वरुप को हटा कर उसे अपेक्षाकृत सुग्राही और नवोन्मेषपूर्ण करने पर विचार रखती है. इस लिहाज से जब संत माने जाने वाले सूफी भी मज़हब की नयी रिवायत शुरू करते हैं तो एक खास किस्म के अल्लाह के बन्दों के निशाने पर रहते हैं.क्यूंकि धरम की पुरानी मान्यताएं टूटती हैं. शैतान की आवाज़ माना जाने वाला संगीत एक तबके को हराम होता है तो दूसरा उसपर झूमता है.यहाँ सूफी भले ही धर्म से पूरी तरह बाहर निकलकर भले ही न सोच पाए हों लेकिन जिलानी साहब ने जिस परिप्रेक्ष्य में उनका उल्लेख किया है उसमें वो बहुत हद तक सही हैं क्यूंकि सूफी धर्म से पूरी तरह बाहर नहीं निकले लेकिन उन्होंने धरम की पूरी तरह से नयी धारणा विकसित की जो भी एक तरह का स्वतंत्र चिंतन तो है ही. अगर सूफी धरम से बाहर निकल जाते तो उनपर भी कम्युनिस्ट होने का ठप्पा लगने का खतरा था.लेकिन कम से कम सूफी इस दृष्टि से निर्विवाद रूप से अहम् हैं की उन्होंने धर्म की संकीर्णताओं से ऊपर उठकर सोचा.भले ही उन्होंने धर्म के ढाँचे को बने रहने दिया हो.इस लिहाज से ये नहीं कहा जा सकता की इस्लाम में स्वतंत्र चिंतन नहीं हुआ. लेकिन एक बात बिलकुल निश्चित है की इसकी कमी और उससे भी ज्यादा इसकी व्यापक स्वीकार्यता इस्लाम में हमें कम दिखती है जिसकी बात भट्ट जी ने की. यहाँ एक नयी बहस जन्म ले सकती है की प्रगतिशीलता या प्रोग्रेस्सिव स्ट्रीम का संचरण इस्लाम में क्यूँ मुश्किल होता है. क्यूंकि रचना ने पानी पोस्ट में कुछ बिलकुल वाजिब प्रश्न उठाये थे की धरम को लेकर परंपरागत मुस्लिम समाज जितना आग्रही और आक्रामक है उतना शायद ही कोई और मज़हब हो.भले ही ऐसा ग़लतफहमी और गलतबयानी को लेकर उपजा हो.यहाँ एक और बात कहने लायक है की हिन्दू समाज भी अपने जिस सहिष्णु होने का दंभ भरता है वो इसीलिये है क्यूंकि उसके पास कुछ सिरफिरे फतवों का हवाला है वरना बाबा पार्टी की कमी यहाँ भी नहीं है.ह्रदय नारायण दीक्षित ने अपने लेख में ऋग्वेद को जिस तरह पेश किया है उससे इतर भी सोचे जाने के ज़रूरत है क्यूंकि मनुवाद अपने आदिम स्वरुप में इसीके पुरुष सूक्त में मिलता है और इसी की वेदवाणी शूद्रों के कान में पड़ने पर सीसा पिघलाकर डाला जाता था.असल में समस्या यह है की हम धर्म को लेकर सोचने बैठते हैं तो बहुत इंटेंस थिंकिंग करते हैं लेकिन धर्म के उसी घेरे के अन्दर सोचते रह जाते हैं.दीक्षित जी का वेदों पर गहन अध्ययन है क्या कभी उन्होंने इसबात का भी संकलन किया है की वेदों की कितनी ऋचाएं अन्यायमूलक हैं.धर्म का आनुयायिक चिंतन खूब होता है.अगर इस चिंतन को पैमाना बनाया जाय तो निश्चित रूप से इस्लाम में भी अभाव नहीं है. अल्लामा इकबाल के उदारवादी नज़रिए को भी इस विचार से हारना पड़ता है तो ज़ाहिर तौर पर ये बहुत प्रबल है.इसीलिए तसलीमा, साइमन जैसी नारीवादी भी धर्म को औरत पर अत्याचार के यन्त्र के रूप में देखती हैं.अपने धर्म की अच्छाइयों को लेकर व्यापक बहस होती है लेकिन इसकी कमियों को उजागर करने सम्बन्धी बहस क्यूँ नहीं होती.कुछ ही रोज़ पहले कल्बे सादिक साहब ने मुस्लिम महिला आन्दोलन के अधिवेशन में इस्लाम में महिलाओं की असहजता पर कुछ बात करते हुए उनकी हिस्सेदारी को लेकर जो सवाल उठाया वो भी कईयों को नागवार गुज़ारा. याद रहे की सादिक साहब ने इसमें ये भी कहा था की पैगम्बरों के ज़माने की हरबात जैसे की तैसी नहीं उतारी जा सकती इससे महिलाओं को खासकर बड़ी तकलीफ होती है.क्यूंकि इनमें से कई बेसिरपैर की हैं. ये एक बड़े दिल वाली स्वीकृति थी जिसकी आलोचना भी कम नहीं हुई उसी तरह जिस तरह सूफियों को भी नकार का सामना करना पड़ा. ये अलग बात है की उदारवादी गैरमुस्लिम सम्प्रदाय दोनों के प्रति सबसे ज्यादा श्रद्धावान रहता है. कल्बे सादिक आज भी सभी मंचों पर सम्मानित हैं. चाहें वह क्रांतिकारी नमाज़ का फैसला हो या कुम्भ में डुबकी लगाने का. सभी कुछ साम्प्रदायिक सौहार्द के लिए संजीवनी का काम करता है.. जब सादिक साहब ने महिलाओं के तकलीफ में होने की बात कही तो मुझे वाल्मीकि रामायण का एक प्रसंग याद आया.मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् राम सीता की तुलना कुत्ते के जूठे घी से करते हुए कहते हैं की "अब तुम सच्चरित्र या दुश्चरित्र जो भी हो मैथिलि. मैं तुम्हारा उपभोग नहीं कर सकता.अब तुम कुत्ते के चाटे घी के सामान हो जिसका उपभोग नहीं किया जा सकता.(वाल्मीकि रामायण ३.२५७.१३).धरम को खारिजं करना मुश्किल काम है लेकिन उदारवादी नजरिया तो रखा ही जा सकता है. और कमसे कम अन्यायमूलक बातों की आलोचना तो होनी ही चाहिए. इसके लिए किसी भी स्वतंत्र चिंतन की बहुत ज्यादा आवश्यकता नहीं है.